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एक कामयाब राह को चुनना एक सफल मुसाफिर की पहचान बन जाती है।

                          'सवाल' क्या सिर्फ घर से निकलने से मंजिले मिलती हैं? क्या सिर्फ चंद किताबें पढ़ लेने से कामयाबी मिलती है? क्या सिर्फ मेहनत करने से सब कुछ हासिल होता है? क्या सिर्फ पैसे कमाने से सुकून मिलता है? ऊपर लिखे ये चार सवाल, जिनका अर्थ समझना जरूरी है। मेरे अनुसार पहले सवाल का जवाब कुछ इस तरह हैं, कई बार मंजिलों तक पहुंचने के लिए घर छोड़ना जरूरी नही होता, और हो सकता है की आपको घर हमेशा के लिए त्यागना भी पड़े, ये सब कुछ निर्भर करता है की आपकी मंजिल है क्या? दूर शहर में बड़ी नौकरी, या अपने शहर में एक 8 घंटे की नौकरी या मनचाहा व्यापार, व्यापार एक छोटी दुकान का भी हो सकता है। अब घर से निकलना या ना निकलना आपकी मंजिल नही तय कर सकता है।  दूसरा सवाल सिर्फ किताबें पढ़ लेने से कामयाबी नहीं मिलती, कई बार हम किताबें पढ़ते तो हैं लेकिन सिर्फ मनोरंजन के लिए या फिर सब्जेक्ट में पास होने के लिए। अगर हमें किताबों से खुद के जीवन को निखारना है तो किताबों का सही चयन भी जरूरी है। किसी एक लेखक को ही पढ़ने से काम नहीं चलेगा, ...

नेताजी सुभाष चंद्र बोस- मिस्ट्री मैन

महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 125वीं जयंती है। देश की आजादी के लिए शुरू हुए महायज्ञ में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों में नेताजी का नाम बड़े गर्व के साथ लिया जाता है। अपने जीवन में एक सफल व्यक्ति होने के बावजूद सुभाष चंद्र ने देश की सेवा करना और देश को आजाद कराने का निर्णय लिया। देश के लिए सुभाष चंद्र बोस ने अपने प्राण तो त्याग दिए लेकिन मृत्यु उनके यश और नाम को आज भी नही मिटा पायी। बोस एक वीर पुरुष के रूप में हर भारतीयों के दिलों में सदा के लिए अमर हो गए। सुभाष का मकसद एकदम साफ था, अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध करके देश को आजाद कराना। सुभाष चंद्र उड़ीसा प्रांत के कटक में 23 जनवरी, 1897 में जन्में थे। इनके पिता जानकीनाथ एवं माता का नाम प्रभावती बोस था। अपने माता-पिता के चौदह बच्चों में से वे 9वें भाई थे।  सुभाष के पिता एक वकील थे और बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे।  सुभाष ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा कटक में पूरी की। सन् 1918 में बी.ए. की डिग्री कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद इंडियन सिविल सर्व...

ये वक्त भी गुजर जायेगा।

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" जान भी और जहान भी दोनों सुरक्षित रहे" अभी सही से डर गया भी नही था और कोरोना ने वापस से दस्तक दे दी। कोविड की मार झेलने वाले संभल भी नही पाए थे, जैसे तैसे अपने कार्यों में वापस जुटने की कोशिश में लगे थे। हालहि में कईयों ने दुबारा से धंधा शुरू किया था। कोरोना के वापसी से लोगों को सता रहा है लॉकडाउन होने का डर। हमें अपने करीबियों के सेहत का डर। घर से दूर पढ़ने और कमाने के गए बच्चे, पति या भाई की बढ़ रही परेशानियों का डर। बाजार में हर एक दुकानदार, सब्जी वाले, छोटे मोटे काम करके अपना घर चलाने वाले लोगों के चेहरे पर दिख रहा है कोरोना का डर। वहीं कुछ लोगों को बीमारी का डर है, तो वहीं कुछ को दो वक्त की रोटी का डर। कोराेना हम सभी के लिए एक जैसा नही रहा है। यहां मौतें सिर्फ बीमारी से ही नही हुई हैं  बल्कि भूख के कारण भी लोगों ने दम तोड़े हैं। यहां लोगों ने पैदल पलायन करके मंजिल पर पहुंचने से पहले दम तोड़े हैं। अस्पतालों में उचित व्यवस्था न होने की वजह से लोगों ने सड़कों पर जान गवां दी। इन सभी डरावनी यादों के चलते एक बार ये डर वापस आ रहा है और डर इस बात का है की इस बार यह कितना दर्दना...

तुम डरते हो किस बात से।

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                        [ 1 ] किसी अनजान के हाथ से या अपनों के साथ से  घनी अंधेरी रात से या पहर की शुरुआत से तुम डरते हो किस बात से। कोई पुरानी बात से या किसी की फटकार से अपनों की उम्मीदों से या दूसरों की तरकीबों से तुम डरते हो किस बात से। बिछड़ते घर के साये से या बदलते घर के हालात से कंधों पर बढ़ते बोझ से या मानवता की सोच से तुम डरते हो किस बात से। दोस्तों के छूटते साथ से या निकलना अपने आप से दुनिया की सोच से या रिश्तेदारों के ज्ञान से तुम डरते हो किस बात से।                           [ 2 ] चाहे जानना नई बात हो या करना कोई शुरुआत हो पढ़नी कोई किताब हो या करनी कोई खुराफात हो सब करना तुमको ही होगा बस इतना तुमको याद हो तो फिर डरने की क्या बात हो। बढ़ते डर का शोर हो या पीछे मुड़ने पर जोर हो शारीरिक कोई खोट हो या दिमाग पर चोट हो रुकना नही है अब तुमको, ये जज़्बा गर साथ हो तो फिर डरने की क्या बात हो। छूटता किसी का साथ हो या डगमगाता विश्वास हो  बैचेनी की कोई बा...

इंटरनेट के तारों में फंसे लोग

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         " इंटरनेट के तारों में फंसे लोग" अत्यधिक आधुनिक बनते-बनते हमने इंटरनेट के तारों की तरह खुदको भी उलझा लिया है। इंटरनेट की परत दिन-ब-दिन हमारे ऊपर पड़ती जा रही हैं और हम उसके प्रति और अधिक आकर्षित होते जा रहें हैं। सोशल मीडिया पर सबसे तेज बनने के लिए लाखों लोगों द्वारा मचाई गई चका-चौंध में हर किसी को आगे निकलना है। लोग क्या खा रहें हैं, क्या पहन रहें हैं, और कहां घूमना पसंद करते हैं, ये सब सिर्फ किसी भी व्यक्ति की प्रोफाइल देखकर समझा जा सकता है।  ट्रेंड्स को फॉलो करते करते लोगों ने अपनी प्राइवेसी कब पब्लिक कर दी जैसे उन्हें पता ही ना चला हो। अपने निजी जीवन की हर एक जानकारी अपने प्रोफाइल पर अपलोड करने के बाद लोग खुदको कूल समझते हैं। कई लोग इंटरनेट का प्रयोग सिर्फ समय गुजारने में करते हैं और कुछ लोग सरकार को गालियां देने में। इसके बाद कुछ इंटेक्चुअल लोग बचते हैं, जो इंटरनेट पर भरपूर ज्ञान देते हैं।  आपको शायद इस बात की भनक तक नही है कि, आपके द्वारा दी गई मामूली सी जानकारी डाटा बनकर करोड़ों में बेची जा रही है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड्स बनते हैं,...

कोरोना में भूख की मार झेलते मजबूर "मजदूर"

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शहर में मजदूर जैसा दर-ब-दर कोई नहीं, जिसने सबके घर बनाये उसका घर कोई नही। जहाँ पूरा देश इस कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा हैं, वहीं दूसरी और देश के मजदूर को कोरोना के साथ-साथ कई और चीजों से लड़ना पड़ रहा है। जहाँ हम सभी घरों में रहकर #stayhome के साथ सेल्फी पोस्ट कर रहें हैं, वहीं गरीब मजदूर के पास न छत है, न पहनने को कपड़ा, और न ही पेट भर खाना। बच्चों के लिए खाना जुटाते-जुटाते अपनी भूख ही भूल चुके हैं ऐसे मजबूर "मजदूर"। खाना खरीदकर खाएं भी तो कैसे तीन सौ रुपये दिहाड़ी कमाकर घर का खर्च चलाने वाले मजदूर के पास बचत के नाम पर बचती है तो सिर्फ "कमाने की उम्मीद"। बीते 2 महीने में जैसे-तैसे हिम्मत रखकर दिन काटते मजदूर अब पेट काटकर गुजारा करने को मजबूर हो गए हैं। हालांकि देश की जनता और सरकार सारे प्रयास कर रही है कि कोई भूखा न सोये लेकिन फिर भी हर एक तक मदद पहुंच नहीं पा रही है। जब मजदूरों की ऐसे हालातों में तस्वीरें आती हैं जहाँ बच्चें भूख से बिलख रहें हैं, गालों पर आंसू सूखकर जैसे किसी कष्ट का चिन्ह बन गए हों। इन तस्वीरों से हम आपको सिर्फ कुछ वक्त के लिए पीड़ा होगी, लेकिन...

कुल्हड़ वाली चाय

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मिट्टी की खुशबू संग कुल्हड़ वाली चाय, देश और दिवानगी जो दोनों बताए। सांवले रंग से मुझे मोहब्बत है, जी जनाब खूब पहचाना मैं चाय का शौकीन हूं। चाय ये एक ऐसा नशा है, कि एक बार अगर लत लग गई तो छोड़ना मुश्किल है। आप शराब का नशा छोड़ सकते हैं, लेकिन चाय का नहीं। अपने समय पर अगर चाय नही मिली तो सर दर्द, आंखों में नींद और सब कुछ खाली-खाली सा लगने लगता है। चाय का नशा सबसे बेहतरीन नशा है, जिसे आप शुकून से किसी अपने के साथ बातचीत करते हुए दो घूंट पी सकते हैं। और भारत देश में इस नशे के सबसे शौकीन लोग हैं। यहां तो अगर आप किसी को चाय न पूछें तो ये विषय गंभीर हो जाता है। चाय पीना और पिलाना यहां कि एक परमंपरा बनी हुई है। बड़े से बड़े फैसले यहाँ चाय पीते पीते ले लिए जाते हैं। जॉब की बात हो या शादी की, लड़ाई हो किसी से या नया-नया प्यार सारी चीजें एक चाय की चुस्की पर हल हो जाती हैं। अगर कई दिनों के बाद किसी दोस्त से मिलना हो तो चाय की टपरी पर मुलाकात को यादगार बनाते हैं। जी यकीन मानिए इस चाय ने कई लोगों का भला भी किया है, आप हमारे देश के प्रधानमंत्री को ही देख लिजिए। यहाँ लोग देश के बड़े-बड़े मुद्दों पर ...