ये वक्त भी गुजर जायेगा।


"जान भी और जहान भी दोनों सुरक्षित रहे"

अभी सही से डर गया भी नही था और कोरोना ने वापस से दस्तक दे दी। कोविड की मार झेलने वाले संभल भी नही पाए थे, जैसे तैसे अपने कार्यों में वापस जुटने की कोशिश में लगे थे। हालहि में कईयों ने दुबारा से धंधा शुरू किया था। कोरोना के वापसी से लोगों को सता रहा है लॉकडाउन होने का डर। हमें अपने करीबियों के सेहत का डर। घर से दूर पढ़ने और कमाने के गए बच्चे, पति या भाई की बढ़ रही परेशानियों का डर। बाजार में हर एक दुकानदार, सब्जी वाले, छोटे मोटे काम करके अपना घर चलाने वाले लोगों के चेहरे पर दिख रहा है कोरोना का डर। वहीं कुछ लोगों को बीमारी का डर है, तो वहीं कुछ को दो वक्त की रोटी का डर। कोराेना हम सभी के लिए एक जैसा नही रहा है। यहां मौतें सिर्फ बीमारी से ही नही हुई हैं  बल्कि भूख के कारण भी लोगों ने दम तोड़े हैं। यहां लोगों ने पैदल पलायन करके मंजिल पर पहुंचने से पहले दम तोड़े हैं। अस्पतालों में उचित व्यवस्था न होने की वजह से लोगों ने सड़कों पर जान गवां दी। इन सभी डरावनी यादों के चलते एक बार ये डर वापस आ रहा है और डर इस बात का है की इस बार यह कितना दर्दनाक होगा। 

एक किस्सा मेरे हिस्से का

अपने शहर से दूर दूसरे प्रदेश में पढ़ने के लिए एडमिशन तो ले लिया था, लेकिन कोरोना ने सभी उम्मीदों पर पानी फेर रखा था। बड़ी मशक्कत के बाद कोरोना की दो लहरें आकर गई और चीजें नॉर्मल होना शुरू हुई। हमें जैसे ही मालूम हुआ कि कॉलेज ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यम से चलेगा, मैंने फौरन अपने एक दोस्त को फोन लगाया और हम दोनों ने कॉलेज जाने का तय कर लिया। अब घर से हम अकेले नही निकले थे, हमारे साथ थी कुछ घर वालों की उम्मीदें और अपने सपने जो दो साल से थोड़ा थक हार से गए थे। लेकिन कोशिश ये थी कि रोज कॉलेज जायेंगे और खूब अच्छे से पढ़ेंगे और बढ़िया सी दिल्ली या मुंबई में नौकरी करेंगे। 

कुछ महीने तो सब ठीक ठाक चल रहा था, तभी एक दिन एक कोरोना के नवजात शिशु ओमिक्रोन ने किलकारी मारी और साउथ अफ्रीका में अपना असर दिखाया। लेकिन बात तब इतनी गंभीर लगी नही। थोड़ा सा संकोच तब हुआ जब कर्नाटक में ये शिशु थोड़ा बड़ा हुआ और अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इकाई दहाईं से ये गिनती सेंकड़ा और हजार में पहुंच गई। बीते दस दिनों में वायरस की चपेट में आने वालों की संख्या 11 हजार से लेकर 1 लाख के पार पहुंच गई।

हर रोज की सुबह हम उठे और पुरानी आदत के चलते फोन बिना चेक किए चार्जिंग पर लगाया और फ्रेश होकर तैयार हो गए, कॉलेज चलने के लिए दोस्त को फोन लगाया तो उसने बोला फोन चेक नही किया क्या, ग्रुप में मैसेज देखो। मैंने पूछा ऐसा क्या हो गया तुम ही बता दो, तभी उसने कहा डिपार्टमेंट में एक अध्यापक और तीन बच्चे कोविड पॉजिटिव हुए हैं। डिपार्टमेंट कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। हमने पुष्टि करने के लिए कॉलेज जाना अनिवार्य समझा और वहां जाकर हमें मालूम पड़ा कि कुछ दिनों के लिए सभी क्लासेज ऑनलाइन मोड में चलेंगी। मन बड़ा खराब सा हो गया, क्योंकि हमें ऑनलाइन क्लास में पढ़ने पर कुछ समझ नही आता और इस समस्या का कारण कुछ भी हो सकता है। बड़ी निराशा थी मन में, चुप-चाप मैं और मेरे मित्र तिवारी जी कोरोना को अनाब शनाब बकते हुए एक चाय की दुकान पर चाय पीने गए। चाय पीते-पीते उपाय सोच रहे थे कि अगर लॉकडाउन लगा तो क्या करेंगे? 

नौकरी भी नही है और अगर नौकरी नही तो घर वापस जाना पड़ेगा। काफी देर तक दोनों ने कई सारी समस्याओं का हल ही निकालने की कोशिश की और अंत में जो होगा देखा जायेगा बोलकर अपने-अपने रूम पर चले गए। आज तीसरा दिन है ऑनलाइन क्लास का और इस चीज से खिन्न होकर ऑनलाइन क्लास का बहिष्कार कर रहें थे। तभी घर से फोन आया, मम्मी हाल चाल लेते हुए बोली कोरोना तो बहुत तेजी से फैल रहा है। वहां कैसी हालत है, अगर ज्यादा केस हो रहें हों तो वापस चले आओ, अंत में खाने का बोलते हुए फोन रख दिया। मम्मी से बात करके अच्छा तो लगा लेकिन एक डर लग रहा है। वापस जाने का डर नही है, डर है कि अगर लॉकडाउन लगा और घर में बंद होना पड़ा तो उन नकारात्मक विचारों से कैसे बचूंगा। नौकरी के डर से कैसे लडूंगा। घर के अकेले बेटे का फर्ज़ आखिर कब समझूंगा। कई सारी मन में विडंबनाए हैं। 


तभी नज़रों के सामने एक झलक दौड़ गई कोरोना की दूसरी लहर में पीड़ित परिजनों की। भूख प्यास के मारे अपने पिता के कंधे पर दम तोड़ते बच्चों की। आखिर क्या बीती होगी उस पिता के दिल पर। कुछ तस्वीरें फोन की गैलरी में पड़ी हुई हैं देखकर मन किंचित हो जाता है। ख्याल बस यहीं आता है कि भगवान दुबारा ये खौफनाक मंजर न दिखाए। किसी की किस्मत में ऐसी मौत न नसीब हो। हालात जल्द से जल्द बेहतर हो जाएं और हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में पहले की तरह खुली हवा में सांस ले सकें। अपना और अपनों का ख्याल रखें। थोड़ी समझदारी बड़े हादसे को टाल सकती है इसलिए कुछ जरूरी नियमों का पालन करें। मुस्कुराते रहें, सकारात्मक रहें।

- आदर्श सिंह




Comments

  1. यथार्थ पूर्ण ,अद्वितीय, अनुपम, लेख।

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