नेताजी सुभाष चंद्र बोस- मिस्ट्री मैन
महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 125वीं जयंती है। देश की आजादी के लिए शुरू हुए महायज्ञ में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों में नेताजी का नाम बड़े गर्व के साथ लिया जाता है। अपने जीवन में एक सफल व्यक्ति होने के बावजूद सुभाष चंद्र ने देश की सेवा करना और देश को आजाद कराने का निर्णय लिया। देश के लिए सुभाष चंद्र बोस ने अपने प्राण तो त्याग दिए लेकिन मृत्यु उनके यश और नाम को आज भी नही मिटा पायी। बोस एक वीर पुरुष के रूप में हर भारतीयों के दिलों में सदा के लिए अमर हो गए। सुभाष का मकसद एकदम साफ था, अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध करके देश को आजाद कराना।
सुभाष चंद्र उड़ीसा प्रांत के कटक में 23 जनवरी, 1897 में जन्में थे। इनके पिता जानकीनाथ एवं माता का नाम प्रभावती बोस था। अपने माता-पिता के चौदह बच्चों में से वे 9वें भाई थे। सुभाष के पिता एक वकील थे और बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। सुभाष ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा कटक में पूरी की। सन् 1918 में बी.ए. की डिग्री कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए 1919 में इंग्लैंड चले गए। उस समय भारतीयों के लिए सिविल सर्विसेज में जाना बहुत मुश्किल था इसके बावजूद सुभाष ने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया था। लेकिन 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए सुभाष सिविल सर्विस छोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। वह चित्तरंजन दास, अरविंद घोष और महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। जिसके चलते सुभाष ने स्वराज अखबार के जरिए अपने विचार रखना शुरू कर दिया। साथ ही ब्रिटिश शासन का विरोध किया और भारतीय राजनीति में रुचि लेने लगे।
नेताजी 1920 और 1930 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कट्टरपंथी, युवा विंग के नेता थे। 20 जुलाई, 1921 में बोस महात्मा गांधी से पहली बार मिले थे। बोस को नेताजी का नाम भी गांधी जी ने ही दिया था। 1923 में स्वराज पार्टी की स्थापना हुई। इसके बाद महापालिका के चुनाव को भी स्वराज पार्टी ने जीत लिया, और दासबाबू को कलकत्ता के महापौर के रूप में चुन गया। महापौर बनने के बाद दासबाबू ने सुभाष को महापालिका का कार्यकारी अधिकारी बना दिया। इस पद पर रहते हुए बोस ने बंगाल में लोगों के अंदर देशभक्ति की आग को भड़का दिया, और बोस एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी युवा नेता बन गए। बोस ने कई आंदोलनों में भाग लिया और कई बार जेल यात्रा भी की। 1929 और 1937 में वे कलकत्ता अधिवेशन के मेयर बने थे। इसके बाद वह 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बन गए, साथ ही 3 मई, 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के अंदर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतंत्र पार्टी बन गई। दूसरे विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले फॉरवर्ड ब्लॉक को तेजी से बढ़ते देख अंग्रेजी शासन ने फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी नेताओं को जेल में डाल दिया। लेकिन सुभाष इस मौके पर जेल में निष्क्रिय रहना नही चाहते थे। सुभाष ने अपनी रिहाई के लिए जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। हालत खराब होने पर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। लेकिन सरकार सुभाष के इरादों से भी अंजान न थी इसलिए सुभाष को उनके घर पर ही नजरबंद कर दिया गया।
1941 के जनवरी महीने में सुभाष अंग्रेजी शासन को चकमा देकर घर से भागने में सफल हो गए और अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी जा पहुंचे। सुभाष ने भारत से ब्रिटिश राज को निकालने के लिए जर्मनी और जापान से मदद मांगी। इसके साथ ही उन्होंने ने 1943 में पूर्वी एशिया में जाकर रास बिहारी बोस से "स्वतंत्रता आंदोलन" का कमान लेकर "आजाद हिंद फौज" का गठन किया और नारा दिया कि "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा"। इस नारे ने अंग्रेजों की नींव को हिला कर रख दिया। वहीं बोस की आवाज़ के पीछे लाखों हिंदुस्तानी अपनी जान देने तक तैयार हो गए थे। सुभाष चंद्र के जोश को देखकर अंग्रेजों को एहसास होने लगा था कि भारत देश की सत्ता अब उनके हाथों से निकलने वाली है।
दूसरे विश्वयुद्ध के समय आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को संबोधित करते हुए नेता जी ने "दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप पर जीत हासिल की। जीत के बाद नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। इसके बाद दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा। 18 अगस्त 1945 में टोक्यो के लिए नेताजी एक विमान में सवार होते हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है और सुभाष की मृत्यु ताईवान में हो जाती है। लेकिन उस दुर्घटना में सुभाष की मृत्यु का कोई सबूत नहीं मिल सका। सुभाष चंद्र की मृत्यु आज भी विवाद का विषय है और यह भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा संशय है।
- आदर्श सिंह
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